شكايت از اوضاع عمومي
| در اسفند ماه 1370 به مناسبت نابسامانيهاي عمومي ايران و جهان و در نتيجه تأثرات ناشي از آن قصيده زير سروده شد. |
| چــون تفتـــــه آهـــني كــه بـــه سندان ! | دارم دلـــي بـــــــه سينــــــه گـــــــدازان | |
| چــون بـــرگ وبـركه در كف طوفان! | چـــون خــــار و خس كـــــه در دم آتش | |
| چــون آهــني كــــه ســـوده بـه سوهان! | چـون ســاغـري كـــه خـورده بــه خارا | |
| آشفتــــــه ازدمي شــــــــرر افشـــــــان! | آكـــــنـده از غــمي جگــــــــر آويـــــــز | |
| چــون مجمـــــري بــه گــونة مــرجان! | چـــون كـــــوره اي بــــه شعلـــة جوّال | |
| بــالا گــــرفته چـــون دل كـــوهــــــان! | آمـــــــاس كـــــــــرده چـــون شكــم كوه | |
| تــنخواه جستـــــه از در ِ خــســـــــران! | كـــــــــالا خـــريـــــده از كــف ِ حسرت | |
| افــســــــرده از جهــــــان ستـمــــــران! | آزرده از زمـــــــــــان الـــــــم خيــــــــز | |
| از ننــگبــــــــاره پــويـــش انســـــــــان! | از زشتـــــــواره جـــــنبش گــــــــردون | |
| ازقــــــوم ِ دل نـهـــــــاده بــــه خــذلان! | از خـــــلق ســـــــرسپــــــرده بــــه آزار | |
| از كـــــار ِ نــــا بــــرسم ِ پـــــريشــان!! | از وضــــــع ِ نـــــابـســــــاز ِ دل آشوب | |
| بـــرســــــر در ِ عمـــــارت ويـــــران؛! | هــــــا اين منــــم كــه كــتيبــــه ي اندوه | |
| در چــــــارچــوب غصّــه بـــه زنـدان! | هــــــا اين منـــم شمـــــايــل افســــــوس | |
| بـگشـــــوده بـــــر ســـــراچة بـُحـــران! | هــــــا اين منــــم دريچــــــة تشــــــويش | |
| بـــــــر درد ِ دل نيــــــافتـــه درمـــــان! | درمــــــــانـــده در كشــــــــــاكش هستي | |
| نبْـــــود نـــــفس كشيـــــدنــم آســــــــان! | كـــــوهي است بـــــر دلـم زغـــم و رنج | |
| دلـــْوي گِــــــران كشـم ز چَــــه ِ جــان! | چــون دم بـــــــــــر آورم ز تــــــه ِ دل | |
| همــــــواره دسـت بــستــــة حــرمــــان! | پيــــــوستـــه پـــــــــاي خستــــــة آسيب | |
| خــونـــــاب خـورده چـون تــره بـرنان! | شوراب رانــــده از مـــــژه بـــــر روي | |
| مــــــرداب نـقش، راكــــد و حيـــــران! | تنــــــديس وار، ســــاكت و بـــــي نقش | |
| افكـــــــار مـن چـو طفــــــل دبستــــان! | آدينـــــــــه ســـــــان مــــلازم تـعطيــل ِ | |
| ديـــــــــري نهـــــان بــه جوف ِ قلمدان! | گـــــويي تــــــراش خــورده نِـــــي استم | |
| تـــــــا، گشتـــــــه زيـــــر دفتــر نسيان! | خـــط خــورده مُــهـــــر ِ ذيــل ِ بــــراتم | |
| متـــواري ِ ديــــــــــــــار غـــريبــــــان! | زنهــــــــاري ِ حصــــــار ِ مسّــخـــــــر | |
| ســـــــرگشتــــــــة مجــــــاري عصيان! | آوارة صحــــــــــــــاري حيـــــــــــــرت | |
| هنــــگـام را نـيــــــــــــافتـــه امكــــــان! | هـنگــــــامه جــوي عــرصـة تقـــــــدير | |
| ســـــرخـــورده از تهمتنــي اين ســــان! | كُــشتي گــــــــِراي پهنـــــة فـــــــرهنگ | |
| دلــخستــــــه از تهـــــــــاجم هــذيـــــان! | بسيـــــــار دان حـــريفِ سخنكــــــــوش | |
| فـــــــــرســـوده در كنـــــــار نيستــــان! | چــون شيــــــر ِ حذف گشتـــه زپـــرچم | |
| در چـــــــالش ِ حقـــيقت و بطــــــــلان! | بــــــا جنــگديــــــــــدگي سپــــــر افكن؛ | |
| خـــــــارم بــه جــــــان خلد ز گــريبان! | از دور بــــــــــاش ِ مــوكب تـهــــــــديد | |
| شد خــــــاطــرم تبـــــــلور كســـــــلان! | درسـينـــــــــــه از تــــــــــــداوم آســـيب |
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دل هـــمچو چشم ســــوزنم از چيست؟ |
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گــــر ســـرمه ام به چشم « صفاهان » |
| نـــي درد خــويش وحجــــره و ايــوان! | درد مــــــــــــنست درد خــــــــــــــلايق | |
| در تنـــــــگنــــاي قلــــت و نقصــــــان! | هـــــرگــــــز نبـــــــــوده ام گــــذران را | |
| بـــــا نــــام و نــــاز و نعمــت وعنـوان! | عنقـــــــــا صفت، به قــــــــاف فضيلت | |
| بي اعتنــــــــا بـــه سُــــــلطة ســــلطان! | بــــودم بـــــــــــَـرّي ز ســــلطنت نــفس | |
| ازبهــــــــــر ســـــرفـــــرازي ايــــران! | جـــــــان در گـــــــرو نهـــــــادم از اول | |
| درجُـــنب و جــوش و جلــوه وجـولان! | عمـــــــــري به رهنـــــــوردي ِ اصلاح | |
| تــــا بــــــر شــود بــه قلـّـــة عمـــــران! | ســـنگ وطـــن بـــه سينــــه زدم سخت | |
| مـــانــد اين رَجـــــا 1 ، بـه پردة كتمان! | ليـــــك از دسيــــسه بـــــــازي اغيـــــار | |
| وز شيـــــــوة گــذشتـــــــه پــشيمـــــان! | هــــــرچنـــــد نيـــــستم گنـــــه آلـــــــود | |
| تـــــــابــوت آرزو، بــــه ستــــودان 2! | لــيكن بـــــــــه دوش مي بــــرم از شهر | |
| خــون مي خورم چو نطفـــه به زهدان! | درمـــــــــاتم مقــــــــاصد و آمـــــــــال؛ | |
| آتــشفشــــــان بــود بــه دلــــم هـــــــان! | تحميـــل جنـــگ و كـــــــوه خسـارات، | |
| از آشـنــــــــا وغيـــــــــردر افغــــــــان! | چون «رستمم» به سوگ «سياووش» | |
| ز«افــــــراسيـــاب» جــور بــه عدوان! | شــــــايد اگــــــــر دمــــــــار بـــــــرآرم | |
| در جــــــان خصم ِ كشـــــور«ساسان» | جــوهـــــــــر شــــوم به خنـــجر پــولاد | |
| آن نـــــــرّه غــولهـــــــاي بيــــــابــــان! | پيكـــــــان شــوم بــــــه چشــم اجــــانب |
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| اوضـــــاع شهــــر، جملــه دژم ســـان! | اخبـــــــار دهــــــــر، جـــمله دژمنــــاك | |
| نيـــــرنـگ و رنــگ و حيلـه و دستـان! | كشتـــــــار وجــــنگ و فتنــــه و آشوب | |
| هــــــر ســــوي، رخ نمـــوده بـه بهتان! | هــــــــر جـــــاي، در گــشوده به تزوير | |
| عـــــــــــالم سيـــــه ز ظلــم فــــــراوان! | گــــيتي تبــــه ز شـــــــرّ بشـــــــــر زاد | |
| كـــــــآنرا نــه ســــر پـديـد و نه سامان! | بــس گفتـــــــه از حقــــوق بشـــر رفت | |
| در ديـــــــــــو لاخ ِ نــــــكبـت ِ دوران!! | نــــايد بــه چشـــــم ، جـــز بــد و بيــراه | |
| قـــــــامـوس رهبــــــــران جهــــــانبان! | خـــالي ز واژگـــــــــان خلــــوص است | |
| اقـليـــم شــــــــــرق، آلـت فـــــرمـــــان! | دنــيــــــــاي غـــــــرب، آيت ِ تخـــريب | |
| قــــــــــائم مقــــــــام مــنطق وجـــــدان! | شـــد فكـــــــــر زرپــــــرســــتي مطلـق | |
| صلـــــــح و صـــــلاح را پــي و بنيان! | كـــــــــار فــــــــروش اسلحـــــه بــركند | |
| از مــــــردمـــي رميــــده ز ميـــــــزان! | نــــــــايد بـــه گــــوش نغمـــــة مـوزون | |
| چـــــون جنـــــگل وحــوش ِ غريوان!3 | دنيـــــــــــا خـــــــراب و درهم و بــرهم | |
| وحشــــي ددان بـــه چنـــگ و به دندان | در جـــــــــان هم فتـــــــاده بـــه وحشت | |
| آهـنـگ جـشنــــــوارة ايـشــــــــــــــان!! | بــــــانگ و غـــــريــو و غــرّش غمبار | |
| ســــــر حلقـــگان شـــورش و طغيــــان | مشتـــــي عنــــــــاد پيشــــــة كيـــن توز | |
| انســـــــــان گــريـــز و عـاري از ايمان | مـــــردم ستيـــــــز و فتنـــــه بــــرانگيز | |
| ظلمت فــــــــزاي گـشتــــه بــه كيهــــان | گــــــيتي مـــــدار گشتـــــــه بـــه نــاحق | |
| ديـــــــــوان درس داده بـــــــه شيطـــان | گــــرگـــــــان ِ حــــــمله ور بــه غزالند | |
| بــــــايد گــــريخت بـــــــر در يـــــزدان | از شــــــــرّ اين قـــــــبيل شيـــــــــاطين | |
| آذر درآيــــــــد از پــــــــــــي آبــــــــــان | تـــــــا در رونــد ِ روز و مــــه و ســال |
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پيــــــــروز بـــاد خيـــــــر و عــدالت |
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بـــــر شــــــرّ و ظلم و كينه و عدوان |
| 1 - رَجا = اميد |
| 2 - ستودان = گورستان |
| 3 - غــَريوان = فرياد كننده ، خروشنده |