به نام خداوند جان وخرد
مولوي
| خلــق را از رازمنديهـــــــات حــيــــــران كــرده اي | مولــوي اي آن كـه كـــشف راز پنهـــــان كــرده اي | |
| جهــل را زيــن دربــرون از راه احســان كــرده اي | يـــــافتي از رازِ حق بــس نـكتـــــــــه ي مجهول را | |
| مي نگنجــد آنچـه پـــالايش بــه هــرسان كــرده اي | عشق را آن گــونه پــــــالودي كـــه در ظرف زمان | |
| وانــمــــودي آنچـــه را اعجـــــــاز دوران كـرده اي | عشق را تــــوصيف هــــا كــردند و تو در هر عمل | |
| در جــدال عشق، شـهمـــات و پــريشـــان كـرده اي | عقـــل را پـهنـــــــه ي شطـــرنــــج درك ِ مــــــاسِوا | |
| بس شكـــايتهـــــا ز رنــج ِ غــربتستـــــان كــرده اي | تــــابــــريـدنــد از نــيستــــــانت بــه كــــــام ديگران | |
| ونــدرين نــالِش چه چــالش ها كه با جان كــرده اي | نـــاله در ني نـــامه كــردي ازغــريبي هـاي خويش | |
| جـان افـــلاكي غميـــن از رنــج هجــران كــرده اي | عــالــم خـــاكــي نبـــــودت جـــــــــاي آرام ونشست | |
| خــانه اي از عشق گــــردونقدر، بنيــــان كــرده اي | بـــرفـــــراز ِ كـهكشـــان ها پـــــاي هشته بي هراس | |
| سوي واجب نــــردبــان از عشق وايمــان كــرده اي | عــالــم امكـــــان بـــرايت تـنـگ وتــــاري مي نمود | |
| شّمـــه اي پيــدا چو مهـــر از ابــر ِ كتمان كــرده اي | از حقـــــايق آنچــه پنهـــــان بـــود از ديــــدار ِ خلق | |
| عشق را آنگه بــــر اين معمـــوره سلطان كــرده اي | كـــــرده اي تسخيــر، ملك ِ فضل را چون شهر ِ دل | |
| كـــآدمي را زين دگـــــرديسي ثنـــــاخوان كــرده اي | «شمس تبــــريزي» نــدانم چون دگــــرگونت نمود؟ | |
| بيقـــــــراري ها ازين اكــــــرام رحمـــان كــرده اي | عشق رحمــــاني تــو را زي رقص عـــرفاني كشيد | |
| ونــدرين دنيــــا صفــــاي خــاص عرفان كــرده اي | «شمس تبريزت» بــه دنيـــــــاي دگــــر شد رهنمون | |
| رقص ِ حق جويـــانه را همسـوي الحـــان كــرده اي | مـــــژده ي حقُ الَــيقينَت بـُــــرد در اوج ِ سمـــــــاع | |
| حكمــت ديــــوانــگي را درس مستــــــان كــرده اي | باده ي عرفان از آن ســاعت كه كردت مست مست | |
| عـــالمــي را از بـــسي غفلــت پشيمـــــان كــرده اي | اين بود گــــر مستي واين گـــــونه باشد وجد و حال | |
| وز به دستــــــــاورد، سهمي بــذل اِخوان كــرده اي | كـنجكــــاويهــــا نـــمودي در پـــس ِ پــستـــوي راز | |
| شعــــر را رخشنـــده خورشيــد درخشـان كــرده اي | آنچـــه بــسرودي بـه نــام " شمس "، در بُــــرج هنر | |
| پرورش هــا داده وآنگــه ســـر بـه فرمان كــرده اي | شعـــــــر و حكمـت را بــمــانند دو طفــل ِ تـــوامان | |
| راه هـــا پـيمـــوده و رجعت بــه ســامــان كــرده اي | نـــــيستي پــيغمبــــر امّــا در ره پـــيغمبـــــــــــري | |
| كــآشيان " قونيــّه " و خدمت بـه " ايران " كــرده اي | زادگـــــــاهت " بلخ " وشعــــرت پـــارسي اي آفرين | |
| درد مــا را همچـو " جـــالينوس " درمــان كــرده اي | اي طــبيب ِ جملـــــه علت هـــــاي مـا در مهد ِ جهل | |
| دفتــــرت رمـــز ِ بقــــاي 2 هـــر مسلمان كــرده اي | مــذهبت هــــر چند بـــودي عشـق و مي جستي فنا1 | |
| " مثنــوي " را مكـتب ارشــــــاد انســـــان كــرده اي | بر " حســـام الــدين " درود از مــا كــه بــا تذكار ِ او | |
| خــدمت اســـلام را تــفسيـــــر ِ قــــــرآن كــرده اي، | آنچــه بــسرودي ز تــمثيــل و حِكـــَم و آيــــات ِ نغز | |
| جـِيب انســــان را رهـــا از چنگ شيطان كــرده اي | زآنچــه گــفتي از حكــايـــات و نــصايح ســــربسـر | |
| كــآن همـه نعمت به پـــايش جملــه قربان كــرده اي | اززبان وچشم "شمس الدين" چه بود آن رمز و راز | |
| بهــــرهمـــــراهيت يــاد " پــور ِدستـــان " كــرده اي | از شكـــوه ِ بـــاستــــانت نــيست غفلــت كــز خـــرد | |
| در ره حق جـــــان فداي جـــان جــانـــان كــرده اي | تــن بــه دنيـــــاي اهــــــورايي سپــردي وز خلوص | |
| عـــالمي را محو ِ اشعـــــــارت بــه ديوان كــرده اي | مولوي، اي از شمــــــار اوليــــــا شــخص ِ شخيص |
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بهــــر مـولانــا سرودن شعر دشوار است « اديب » |
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كسب ايــن تـــوفيق از درگـــــاه يـــزدان كرده اي |
| 1 - مقصود فناء في الله است . |
| 2 - مقصود بقاء بالله است. |