پيام خليج فارس به بحر خزر
| پيــــــام من بـه تـو، اي بيكرانه بحر«خزر» | خـلـيـج فـــــارس، منم طـُـرفهي بحر پهناور | |
| پـــيـــــــــــام مــن به تو، اي دلنوازِ جانپرور | پــيــامِ مـن به تو، اي جـــانفزاي روح انگيز | |
| پـــيــــــامِ مــن بـه تـو، اي فرّ وناز را منظر | پــيـــامِ مــن بــه تـو، اي اهلِ راز را منظور | |
| كه هست جلوهنمــــــا، چون درخششِ گوهر | درود بــر تــو و آن مـوجهـــــــــاي زرّينت | |
| كـه هـر دم است نمايــــــان به گونهئي ديگر | درود بر تــــو و آن رنگهـــــــــاي دلـجـويت | |
| تـوئي ستوده فـَـراينك چـــــــو چشمهي كوثر | تــوئي گشــــاده دل اكـنـون چــو پهنهي آفاق | |
| خـروشِ مـوجِ تـو غرُُّان چـــــو نعرهي تندر | صفـــاي روي تــو دلـجو، چو خندهي گلزار | |
| منت بــرادرم از دودهئــي كــيـــــــــــاني فـر | تـــوام بــرادري، از مـــــادري هـمايــون پي | |
| كفِ تـــو نيز گــريبـــانگشــــــاي ايــن مادر | ســرم نــهــــــــاده بــه دامــانِ پاك ايـرانست | |
| كـــــــه خــوش بخدمت او تنگ بستهئيم كمر | مــن و توئيم بــه هنجـــارِ برتري، هـمـدوش | |
| تــو از شمـــــال، فــرحزاي روحِ اين كشور | مــن از جنـــــــوب، نوابـخشِ جـسمِ ايــرانــم | |
| مــن از جنوب بــــه دامــــــــانِ او بسايم سر | تــو از شمــــــال زسـامــانِ او بـيـابي مــهـر | |
| مــنــم بـــــه خدمتِ تن، اين بزرگ را چاكر | تـــوئي به راحتِ جـــان، اين عزيز را خادم | |
| مــنــم بـــه صرفِ «طلاي سيه» ورا رهبر | تــوئي بــه نقدِ نشــــاط و فــرح، ورا گنجور | |
| كـــه بحرِ «قزوين1»باري توراست نامِ دگر | بــوَد زنـــــــــــــامِ تــو پیدا، كـز آنِ ِ ايـرانـي | |
| زكـيـد و قهرِ كمـــــاندار دهر، خوف وخطر | بهوش بـــــاش كه همچون منت بود به كمين | |
| ز روي حيلــه بصـــد رنگ، دستِ دستانگر | چه نقشههــا كه كند طرح، پشت پردهي كين | |
| بـسي حــوادث خــونينِ مـــــــــانده در دفتر | به يــــاد دار كـه بگذشت بر تو، همچون من | |
| ز زخـــمِ نــيــزهي اغيــــــار و آبگون خنجر | چـه سيلها كه روان شد تو را زخون به كنار | |
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| كــنــم گــــزاره ترا، شـــــرحِ قصه سرتاسر | زسرگــــذشتِ من اي دوست گرنئي آگــــــاه | |
| فـــراغــتــي و حــيـــاتي، رها ز فتنه و شر | زديــربــــــــاز، مـــرا در كنارِ ايـــــران بود | |
| مــقــّـرِ كشتي ايـــــــــــران و مـــوضعِ لنگر | همــاره بـودهام از عهد «كورش» و «دارا» | |
| بـــه رهگــذارِ سفائن، بگــــــــاه سير و سفر | همـــاره عرصهي جولان «پارسها» بـودم | |
| كــــه بود هر شب و روزم نشـــــاط افزونتر | چه سالهـــــــــــــا سپري شد بگونهئي بشكوه | |
| بــه هــر كــرانــــهام ازنـــــــاز، بارهي بندر | بــســـا كـــه از رهِ عـمران بر آسمانها سود | |
| كـــه بـــــــــاز شــد رهِ ادبـارِ خطـّـهي خاور | وليك از پـس اقبال «غريبان» زي «شرق» | |
| شــدم دچـــــــار، بـصد پـــاره احتمالِ ضرر | شـــدم اسير، بـــــه صدگونـــه ابتلاي تـَعـَـب | |
| گـــــه «انگليس» بـــرانگيخت بر درم لشكر | گــهــي «هلند» بـــرآهيخت بـر سرم شمشير | |
| كه بود درسرشــــــان فكرِ سيم و غارتِ زر | مــرا رسيد، هـــــم از«پــرتغاليــان2» آسيب | |
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بــرفت بـــــــــانـــگ و فغانم به گنبدِ اخضر |
نــبــود امــن و امــــــــــانم ز دزدِ دريـــــائي | |
| رهـــائي از كــفِ بـــيـگـــــــــانه يافتم، ايدر | ولــي بــه همّـت ايران و پــــايداريِ خــويش | |
| هـــزار گــــونه ستم رفت بـــــــر سرم يكسر | دريــغ كـــز پس يك نيمه قرن از آن ايـــــــام | |
| زبــعــدِ قــــدرتِ ايران به روزگـــــــارِ قجر | چو بــــر جزايرِ من چيره گشت «استعمار» | |
| فـشــــاند بـر ســرم آتشفشــــــانِ فـتـنـه شرر | ربـــود از كــــفــم آهن ربـــاي خـُـدعه، نقود | |
| ربـــود اجـنــبـي رو سيــــــــــاهِ غــارتــگــر | هـــر آنچــه معدنِ «زرِّ سيــــــاه» بود مـــرا | |
| گــشود نهضتِ ايـــرانـيــــــــــان قــلاع ظفر | وليك از پس چندي، بلطف بـــــــــار خــداي | |
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بــرون زقبضهي اغیـــار، مــرده ريکِ پدر |
درود بـــاد بـــر آن پورِ نــــــامدار كه كـرد3 | |
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| چــو بــــرفروخت «عراق» از پي نبرد آذر | گــــرفت دامنم آتــش بـــه واپسين ايّـــــــــــام | |
| كــــه جــز هلاك و تبــــــــاهي نداد هيچ ثمر | چــــه گويــم اينكه شدم صحنهي نبردي شوم | |
| كـــــــــــــه شد پــديـــد ز جيشِ عـراقيِ بربر | نــعــوذُ بالله از آن فــاجعـــاتِ «خــرمشهر» | |
| كـــــــــه بـــود جيش عراقي از آنگروه بَـتـر | مـگــوي «بـربـر» و تهمت به بربري مپسند | |
| زبسكــه نـــــاظرِ پيكـــــــــار بودم از هر در | زبسكـــه شـــــــــــاهدِ كشتار بودم از هر سو | |
| زبسكــه در بـــــــر من قطعه قطعه شد پيكر | زبــسكــه در بـــرِ مـــن لخته لخته شد كشتي | |
| نمـاند شور و نشاطم چــــو خــاطرِ مُـضطر | نــمــاند تـــــــــاب و تـوانم چو پيكر مجروح | |
| بــــرآمد از ســــر كيــن زآستين جنگ، بـِدر | هــم از پــي آمدِ آشـوب، دستِ «آمـريكــــا» | |
| بــسوي مــن كــه زايرانيـــــــــــان بكوبد سر | گـُـسيل داشت گـــران نـــــاوهاي كـــوه اندام | |
| كـــــــه بود حــافظِ ايـــران زمين مهين داور | نيافت گر چه مجـــــالي بـــه اقتضـاي زمان | |
| در آسمـــــــــــان و به زیر آوریدشان ز زبر | وليك بر سرِ سيصد مســـــــــافر آتش رانـــد | |
| كــه بـــــــا دريغ ز خلقِ جهان گداخت جگر | فغان و آه ازین مــــــــــــــاجرای زَهره گداز | |
| كــه مهر و مـــاه بگرييد ازآن چو يافت خبر | دريــغ و درد ازين ارتكــــــــابِ دهشت خيز | |
| كــــــــه دستمايهي شرّ است و پـاي لغزِ بشر | خداي بركند از بـُـن، اســـــــــــاسِ ايـن بيداد | |
| بفـــرق ِ فــرقــهي آزارمندِ بـــــــــــــد گوهر | خــداي بشكند ايـن طــــــــاق نـُه رواقِ سپهر | |
| بـــمـــرز ِ ايــــــــــــران وينم هماره مَـدِّ نظر | دريــن جـــهــان منم القصّه يـــــــــافته پيوند | |
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بـكــام
ِ دوست منم جـــاودانه
گوهر خيز بـنــــام ِ «پــارس» منم در زمانه نامآور |
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1–
درياي خزر به نامهاي درياي مازندران،بحر قزوين و درياي كاسپين نيز
خوانده شده است. 2
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اشاره به تجاوز پرتغاليان بر بعضي از جزاير خليج فارس است كه توسط شاه
عباس دفع گرديد. 3 – اشاره به ملي شدن صنعت نفت در سراسر ايران به رهبري شادروان دكتر محمد مصدق است. |